जासूस डेस्क
जासूसी कथा साहित्य में अगर आपकी अभिरुचि है तो आपने असरार अहमद यानी इब्ने सफी के उपन्यासों को जरूर पढ़ा होगा। अगर उनको नहीं पढ़ा तो क्या पढ़ा। इलाहाबाद में जन्मे इब्ने ने अपना अंतिम समय बेशक कराची में गुजारा हो, मगर इनका लेखन जिस तरह दो पड़ोसी मुल्कों में मशहूर हुआ, उसका अगाथा क्रिस्टी ने भी लोहा माना। उनके जासूसी दुनिया सीरीज ने तो धमाल मचा दिया। इस शृंखला के अंतर्गत सफी ने 125 उपन्यास लिखे। इसी तरह इमरान सीरीज में उन्होंने एक के बाद एक 120 उपन्यास लिखे।
सबसे जुदा लेखक
इब्ने सफी जासूसी कथा साहित्य रचने में सबसे अलग थे। सबसे खास बात यह थी कि वे दूसरे लेखकों की तरह अपने उपन्यासों में अश्लील दृश्य नहीं रचते थे। दरअसल, किसी ने उनके सामने कह दिया था कि उर्दू में कामुक कहानियां ही बिक सकती हैं। इस बात से सफी साहब सहमत नहीं थे। इसके बाद तो उन्होंने ठान लिया कि वे अपने उपन्यासों में कामुकता नहीं परोसेंगे। यही किया उन्होंने। इब्ने सफी ने साफ-सुथरे और रोचक जासूसी उपन्यास लिखे। ये सभी लोकप्रिय हुए।
बचपन से था पढ़ने का चस्का
इब्ने सफी को बचपन से पढ़ने का शौक था। प्राथमिक शिक्षा के बाद वे मां के साथ इलाहाबाद चले गए। पिता सफी उल्लाह वैसे भी अपनी नौकरी के कारण बाहर चले जाते थे। कहते हैं कि इब्ने जब आठ साल के थे तभी उन्होंने उर्दू-फारसी के उपन्यासों को पढ़ना शुरू कर दिया था। उन्होंने इविंग क्रिशिचयन कालेज से माध्यमिक शिक्षा पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गए। हालांकि बाद में उन्हें आगरा जाकर बीए की पढ़ाई पूरी की। तब कौन जानता था कि इब्ने सफी जासूसी उपन्यास लिखना शुरू कर देंगे। दरअसल, हुआ यह कि अब्बास हुसैनी ने नकहत हसन पब्लिकेशन शुरू किया। यही वह प्रकाशन था जिसने सफी का पहला उपन्यास ‘दिलेर मुजरिम’ छापा। इसके बाद तो वे जासूस साहित्य के बड़े लेखकों की कतार में शामिल हो गए। इसके बाद तो वे लिखते चले गए।
25 साल में करीब ढाई सौ उपन्यास
इब्ने सफी को कैंसर न हुआ होता और 52 साल की उम्र में निधन न होता तो वे तीन सौ से ज्याद उपन्यास लिखते। हालांकि शुरुआती दौर में उनके लेखन की रफ्तार इतनी अधिक थी कि ताज्जुब होता है। कहते हैं वे पंद्रह दिन में एक उपन्यास लिख लेते थे। उनकी बेटी नुजहत का कहना था कि उनके पिता दिन में सोते थे और पूरी रात लिखते थे। हालांकि बाद में सफी के लिखने की रफ्तार धीमी हो गई। मानसिक रूप से इतने बीमार पड़े कि तीन साल तक उन्होंमे कुछ नहीं लिखा। जब स्वस्थ हुए तो फिर से लिखने लगे। उन्होंने देवकीनंदन खत्री और गोपाल राम गहमरी की लेखन परंपरा को समृद्ध किया।
मासिक उपन्यास के जनक
वह 1952 का साल था, जब असरार अहमद नाम का नौजवान जासूसी उपन्यास लिखते हुए मशहूर उपन्यासकार इब्ने सफी बन गया। इसी के साथ नकहत हसन की किस्मत बदल गई। फिर तो उर्दू उपन्यास लोगों में छा गए। सफी के सुझाव पर ही प्रकाशक ने मासिक जासूसी उपन्यास की शुरुआत की। इसी कड़ी में पहला उपन्यास ‘दिलेर मुजरिम’ आया। इसी के साथ असरार अहमद इब्ने सफी के नाम से चर्चित हो गए। यही वह दौर था जब सफी पाकिस्तान चले गए। फिर भी भारत में उनके पाठक उनके उपन्यास का इंतजार करते। नकहत प्रकाशन यहां सफी के उपन्यास लगातार छापता रहा। साल 1955 में सफी ने इमरान सीरीज की शुरुआत की। इस शृंखला का पहला उपन्यास ‘खौफनात इमारत’ छप कर सामने आया। यह चार महीने के अंतराल में दोनों देशों में छपा और इसे लाखों पाठकों ने पढ़ा।
हालांकि एक दौर ऐसा भी आया जब इब्ने सफी ने कराची में असरार नाम से ही प्रकाशन शुरू किया। इसके बैनर तले जासूसी दुनिया का पहला अंक ‘ठंडी आग’ छापा। फिर इसी को भारत में नकहत प्रकाशन ने प्रकाशित किया।
अगाथा क्रिस्टी ने भी लोहा माना
जासूसी साहित्य के इस धुरंधर लेखक से दुनिया भर में मशहूर जासूसी लेखिका अगाथा क्रिस्टी भी प्रभावित थीं। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के इस विख्यात लेखक का लोहा माना। उस दौर में उन्होंने सफी के लिए कहा था-मुझे उर्दू का ज्ञान नहीं पर मुझे उपमहाद्वीप के जासूसी लेखकों के बारे में पता है। लेकिन मुझे मालूम है, वहां एक ही मौलिक लेखक है और वो है इब्ने सफी। … हालांकि सफी अपने कुछ उपन्यासों को मौलिक नहीं मानते थे। वे यहां तक कहते थे कि उन्होंने कुछ कहानियों के प्लाट विदेशी उपन्यासों से उठाए। जो भी हो, उनके जासूसी उपन्यासों में रहस्य, रोमांच के साथ हास्य का भी पुट रहा। यही नहीं उन्होंने जासूसी लेखन में विज्ञान कथाओं को भी प्रस्तुत किया। जेब्राधारी मनुष्यों से लेकर कई वैज्ञानिक कल्पनाओं को •ाी सामने रखा। ये सभी इतने दिलचस्प थे कि इसे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया।
चारपाई ही थी इब्ने की दुनिया
अपने उपन्यासों से दुनिया जहान की सैर कराने वाले इब्ने सफी कभी विदेश गए ही नहीं। मगर वे इस तरह लिखते थे कि इस खास देश का ब्योरा एकदम सच्चा और सटीक होता था। यह कैसे करते थे सफी? दिलचस्प यह कि वे खुद कहते थे कि मेरी चारपाई मुझे सब जहानों की सैर करवा देती है। यह सच भी है कि क्योंकि उनकी चारपाई के पास ही पाठकों की चिट्ठियों का ढेर लगा रहता था। सफी के बेटे भी कहते थे कि उनकी चारपाई ही उनके लिखने की जगह थी।
कितने जुनूनी लेखक थे इब्ने सफी। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे जेम्स बांड से लेकर हिचकाक के प्रशंसक थे। वे अंग्रेजी फिल्में भी देखते। यही वजह है कि उनके लेखन विदेशी साहित्य का प्रभाव दिखता है। फिर भी कितना कुछ लिखा उन्होंने। यहां तक कि अपने अंतिम समय में भी ‘आखिरी आदमी’ नाम से उपन्यास लिख रहे थे। इब्ने सफी मरे भी तो अपने जन्मदिन पर। कैसा इत्तफाक है।
इस उपन्यासकार ने अपने लेखन से जासूसी साहित्य को जिस तरह समृद्ध किया वह अकल्पनीय है। सफी की ऐसे ही प्रशंसक नहीं थीं अगाथा क्रिस्टी। हिंदी और उर्दू के पाठकों की तीन पीढ़ियों की मोहब्बत यूं ही नहीं मिली सफी साहब को। यह मोहब्बत आज भी तारी है।
