-अंजू भाटिया
किंग्सवे कैम्प में हमारी दुकान हुआ करती थी ‘भाटिया जनरल स्टोर’, जो दालों आदि सामान के अलावा चाय-पकौड़े के लिए मशहूर थी। पुदीने की ताजी हरी चटनी के साथ आलू वाले ब्रेड पकौड़े की धूम काफी दूर दूर तक थी। तब मिक्सी नहीं होती थी, पत्थर के दवरी डंडे में चटनी पीसी जाती थी जिसमें बहुत मेहनत लगती थी।
चाय पकोड़े की वजह से बर्तन भी खूब जूठे होते थे तिस पर उस समय घरों में नल नहीं हुआ करते थे। मेरी मम्मी दूर से पानी भर कर लाया करती। दोनों हाथों में बाल्टी और सिर पर पीतल की पानी से भरी गागर! सोच कर ही सिहर जाती हूं कि वह उठाती कैसे होंगी। दुकान के साथ साथ पापाजी जिल्दसाजी का काम भी किया करते थे जिसमें मम्मी भी पापा जी के साथ कंधे से कंधा मिला कर साथ देती।
पापाजी बुक बाइडिंग का सामान लेने बाजार जाते तो नए कॉमिक्स और नॉवेल भी ले आते जिन्हें किराए पर दिया जाता था। आज भी पुराने लोग हमें इसी नाम से पहचानते हैं- अच्छा आप भाटिया जी की लड़की हो! अरे उनकी दुकान से लेकर बहुत नॉवेल पढ़े हमने! … यह सुन कर सच्ची बहुत खुशी होती उस समय।
उस समय संयुक्त परिवार हुआ करते थे जिसमें दादी, चाचाजी, मम्मी-पापा, हम पांच भाई-बहन और मेरे छोटे मामा। नाना-नानी न होने के कारण छोटे मामा हमारे साथ ही रहा करते और पढ़ाई के साथ साथ जिल्दसाजी के काम में हाथ बंटाया करते। दादी को मिलने आने वालों का अक्सर तांता लगा रहता और मेरी मां सारा दिन काम में लगी रहती। मुझे कभी-कभी बहुत गुस्सा आता था कि मां को पल भर भी आराम करने का समय नहीं मिलता था।
मेरे पापाजी स्कूल में नौकरी भी करते थे। दोपहर तक नौकरी…फिर दुकानदारी…फिर बुक जिल्दसाजी…बाजार से सामान लाना और सारा दिन काम में लगे रहना। इतनी मेहनत की उन्होंने! पर अब कभी-कभी अफसोस करते हैं कि तेरी मां को समय नहीं दे पाया। बहुत जल्दी चली गई वो।
जब मां चली गई… तोसारी दुनिया रुक गई जैसे। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी सिर्फ दस साल की और सबसे छोटा भाई मात्र डेढ़ साल का। अब मोर्चे पर आ डटी मेरी बूढ़ी दादी, जिन्हें हम अम्मा कहा करते थे। गोरी चिट्टी, मध्यम कद, खूबसूरती की मल्लिका मेरी अम्मा।
हम सभी के ढेर सारे कपड़े धोना। उस समय थाल में कपड़े धोए जाते थे, एक-एक कपड़े को रगड़-रगड़ कर साफ करना, हमारा हर तरीके से ख्याल रखना, पलंग के पाये से बांध मधानी से छाछ बनाना, मक्खन निकालना, हमारे सिर में भर-भर कर तेल लगाना और जबरदस्ती हमारी आंखों में पीतल के मोटे सुरमचू से सुरमा लगाना।
मैं हर काम में उनकी मदद करती। चारपाई पर गेहूं धोकर सुखाना हो या कोयले की केरी के गोले बनाना, बर्तन धोने हो या भाई-बहनों की देखभाल करना… पता ही नहीं चला कि कब नन्हीं सी बालिका अपना बचपन भूल छोटे भाई-बहनों की मां बन गई।
मेरी अम्मा ने बहुत साथ दिया हमारा। कड़ी नजर रखती थी हम पर। पढ़ी-लिखी नहीं थी फिर भी अक्सर हमारी कॉपी-किताबें चेक किया करती कि कहीं इसमे कोई लव लेटर तो नहीं। बाहर बन्नी पर तो बिलकुल नहीं खड़े होने देती थी ताकि हम इधर उधर न देखें और कोई हमें न देखे। पूरे दिन का हाल-हवाल पूछती। कोई सहेली भी आती तो छुप-छुप कर हमारी बातें सुनतीं। उन्हें सदा हमारी चिंता लगी रहती कि बिन मां की बेटियां बिगड़ न जाएं।
कई बरस पहले 14 फरवरी वैलेंटाइन वाले दिन 102 साल की उम्र में अम्मा चली गईं। वो तो अभी भी नहीं जाना चाहती थी। अभी हमारे साथ जीना चाहती थी। सच बताऊं मम्मी के जाने के समय हम भाई-बहन बहुत छोटे थे, अम्मा ने हमें संभाल लिया। अब अम्मा के जाने के बाद संभलना थोड़ा मुश्किल लग रहा था।
मम्मी के जाने के बाद पापाजी ने खुद को हमारे पालन पोषण और अम्मा की सेवा में पूर्ण समर्पित कर दिया। अम्मा पापाजी के हर सुख-दुख की साथिन थी… एक कर्मठ और जुझारू महिला। उनके बारे में संस्मरण तो क्या उपन्यास लिखा जा सकता है।
(लेखिका कहानीकार हैं)
