नई दिल्ली। एक ऐसी जासूस जिसे दस महीने तक नाजियों ने यातना दी, मगर उसने न कोई राज उगला और न ही अपना असली नाम बताया। नतीजा मौत की सजा। गुस्साए नाजियों ने उसे गोली से उड़ा दिया। कौन थी यह जासूस? कोई दो राय नहीं कि जब किसी महिला जासूस की जीवटता और संघर्ष पर कोई स्वतंत्र गाथा लिखी जाएगी, उसमें नूर-उन-निसा-इनायत खान उर्फ नूर इनायत का नाम अग्रणी रहेगा। नूर भारतीय मूल की थीं और ब्रिटेन और फ्रांस दोनों के लिए जासूसी की।
देश से नहीं की गद्दारी
आज जब जासूस कुछ घंटों की यातना के बाद टूटने लगते हैं वहीं नूूर इनायत दस महीने तक यातना सहन करती रहीं। उनके पिता हिंदुस्तानी थे। जबकि मां अमेरिकी थीं। नूर का शुरुआती पालन-पोषण फ्रांस हुआ था। मगर बाद में वे ब्रिटेन चली आर्इं और नाजियों के हमले के बाद ब्रिटिश सेना में शामिल हो गर्इं। फासीवाद से लड़ना ही उनके जीवन का ध्येय बन गया था। बाद में नूर वायुसेना की महिला इकाई में भर्ती हो गर्इं। यही वह जज्बा था जिसकी वजह से उन्होंने अपने देश से कभी गद्दारी नहीं की।
बन गईं ब्रिटेन की सीक्रेट एजंट
अपनी कई खूबियों के कारण नूर इनायत का करिअर परवान चढ़ता गया। वे धारा प्रवाह फ्रेंच भी बोल लेती थीं। इसकी जानकारी ब्रिटेन के उस सीक्रेट ग्रुप के पास पहुंची जो गुप्त मिशन चलाता था। इस ग्रुप को खुद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने बनाया था। इस तरह नूर इनायत 1943 में सेना की सीक्रेट एजंट बन गर्इं। वैसे उनके बारे में कुछ दिलचल्प बातें भी सामने आती हैं। जैसे कहा जाता है कि वे टीपू सुल्तान की वशंज थीं। दरअसल, उनके पिता टीपू के परपोते थे। वे एक धार्मिक शिक्षक थे। भारतीय सूफी दर्शन को पश्चिम तक पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है।
जब चकमा देकर भाग निकलीं
कहा जाता है कि नूर इनायत हिंसा पसंद नहीं करती थीं। इसलिए उन्हें गुप्त अभियान के लिए योग्य नहीं माना गया। मगर उनके अधिकारी उन्हें जीवट महिला मानते थे। इसलिए उनको जासूसी का पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया। वैसे उनको रेडियो संचालन का प्रशिक्षण मिला। उन्हें मिशन पर पहले फ्रांस भेजा गया। हालांकि वहां जासूसों को पकड़ लिए जाने का हमेशा खतरा रहता था। क्योंकि जर्मनी की पलिस इलेक्ट्रानिक संकेतों को पकड़ लेती थी। नूर वहां लंबे समय तक काम कर पाएंगी इसका भरोसा ज्यादातर को नहीं था। मगर वे कितनी होशियार और सतर्क थीं, इसका पता इसी से चलता है कि जर्मनी में उनके साथी धर लिए गए मगर नूर भाग निकली।
पक्की जासूस थी नूर
नाजियों के जुल्म के कारण सूफीवादी विचारधारा की नूर कई बार विचलित हो जातीं थीं। अत्याचार की कहानियां सुन कर वह बौखला जाती थीं। इसलिए उनके मन में देश की सेना में शामिल होने का जज्बा पैदा हुआ। ब्रिटेन की वायुसेना में वायरलेस आपरेटर जरूर बनीं मगर अपनी योग्यता और मेहनत से एक साल में ही सैन्य अधिकारी बन गर्इं। शुरुआती दौर में उन्हें बतौर जासूस फ्रांस भेजा गया था। वहां उन्होंने दो साथियों के साथ प्रशिक्षण लिया। इससे जासूसी करना उनके लिए आसान हो गया। इसके बाद उन्हें जर्मनी भेजा गया जासूसी के लिए। वहां की सीक्रेट पुलिस को अच्छा-खासा चकमा दिया। मगर एक दिन जर्मनी की सुरक्षा सेवा ने पकड़ ही लिया।
यातना बहुत सही, पर मुंह नहीं खोला
नाजियों ने हत्थे चढ़ी नूर से लंबी पूछताछ की। मगर उनसे कोई राज नहीं उगलवा सकी। हालांकि इस दौरान नूर ने भागने की भी कोशिश की। मगर वे नाकाम रहीं। तब उनहें जर्मनी जेल भेज दिया गया। वहां तमाम यातनाओं के बाद भी नाजी उनका असली नाम नहीं जान सके। आखिरकार एक यातना शिविर में तीन साथियों के साथ नूर को गोली मार दी गई। इस तरह महज तीस साल की उम्र में उनके जीवन का संपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
नूर की यादों को सहेजा गया
फ्रांस और ब्रिटेन में आज भी नूर इनयात की बहादुरी तथा निष्ठा की चर्चा होती है। अफसोस कि भारतीय मूल की इस विख्यात जासूस को भारत के लोगों को ज्यादा नहीं मालूम। नूर के योगदान को फ्रांस ने सिर-माथे पर लिया। उन्हें सैनिक सम्मान दिया। वहीं ब्रिटेन ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। यही नहीं उन पर डाक टिकट भी जारी किया। इसके अलावा नूर की गौरवशाली स्मृतियों को अक्षुण्ण रखने के लिए लंदन में एक स्मारक बनवाया। नूर इनायत की दिलेरी और समर्पण को नमन।
