अपने-अपने कबीर
-घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ जैसे ही मस्जिद के लाउडस्पीकर से तेज आवाज में अजान शुरू हुई, पास ही बने मंदिर में बैठे पुजारी पंडित रामदीन बुरा सा मुंह बना कर अपने…
जासूस जिंदा है, एक कदम है जासूसी लेखन की लुप्त हो रही विधा को जिंदा रखने का। आप भी इस प्रयास में हमारे हमकदम हो सकते हैं। यह खुला मंच है जिस पर आप अपना कोई लेख, कहानी, उपन्यास या कोई और अनुभव हमें इस पते jasooszindahai@gmail.com पर लिख कर भेज सकते हैं।
-घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ जैसे ही मस्जिद के लाउडस्पीकर से तेज आवाज में अजान शुरू हुई, पास ही बने मंदिर में बैठे पुजारी पंडित रामदीन बुरा सा मुंह बना कर अपने…
- संजीव सागर इक सिवा तेरे अब नहीं दिखता,है मगर मुझको रब नहीं दिखता। हर तरफ है बहार का मौसम,क्या करूं मैं वो सब नहीं दिखता। है नजारा तिरा…
नई दिल्ली। साहित्य के पन्नों से होता हुआ कोई जासूस अपने कारनामे रूपहले पर्दे पर दिखाता है तो वह दर्शकों का ध्यान खींच ही लेता है। वहीं दूसरी ओर कई…